वास्कोडिगामा ने नहीं खोजा भारत, एक व्यापारी का पीछा कर पहुंचा था यहां

                                                                इंटरनेशनल डेस्क
हमेशा यह कहा जाता है कि भारत की खोज वास्कोडिगामा ने की थी। लेकिन, इस तथ्य को सुरेश सोनी ने अपनी किताब ‘इंडियाज साइंटिफिक हेरिटेज’ में गलत बताया है। उन्होंने पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के हवाले से लिखा है कि वास्कोडिगामा एक खोजी व्यापारी की तरह ही एक गुजराती व्यापारी के जहाज का पीछा करते-करते भारत पहुंचा था।
 डॉ. वाकणकर की रिपोर्ट के मुताबिक, वास्कोडीगामा ने खुद अपनी डायरी में लिखा है कि अफ्रीका के जंजीबार में उसने अपने जहाज से तीन गुना बड़ा एक जहाज देखा था। यह जहाज चंदन नाम के एक गुजराती व्यापारी का था, जो भारत से मसाले लेकर अफ्रीका आता था और इसके बदले में हीरे ले जाता था।चंदन और उसके जहाज को देखकर वास्कोडिगामा समझ गया था कि चंदन ऐसे देश से आता है, जो काफी संपन्न है। इसी के चलते वह चंदन के जहाज का पीछा करते हुए भारत आ पहुंचा था।बता दें कि सुरेश सोनी की किताब का यह मुख्य अंश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ के एक अंक में भी पब्लिश हो चुका है।
 
इतिहासकारों के मुताबिक, वास्कोडिगामा पुर्तगाल से 8 जुलाई 1497 में भारत की तलाश में निकला था। वास्कोडिगामा और उनके साथी अरब देशों के साथ यूरोप व्यापार करते थे। वह अरब देशों से यूरोप मसाले जैसे काली मिर्च और चाय खरीदते थे।
यूरोप के लोगों को इसी बात पर आश्चर्य होता था कि अरब सूखाग्रस्त देश हैं, तो उसके देश में ये मसाले कहां से आते हैं। इसी के चलते यूरोप के कई नाविक इसी का पता लगाने के लिए निकल पड़े। इन्हीं में से एक वास्कोडिगामा भी थे।
इतिहासकारों की मानें तो वास्कोडिगामा पुर्तगाल से दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे, यहां उन्होंने कई इंडियन के जहाज देखे और पता लगाया कि भारत के नाविक अफ्रीका से बिजनेस करते हैं। इसी बात से वास्कोडिगामा ने भारत तक पहुंचने के समुद्री मार्ग का अंदाजा लगाया और सीधे हिंद महासागर जा पहुंचे।
हालांकि, इस लंबे सफर में खाने-पीने की सामान की कमी हो गई और इसके चलते वास्कोडिगामा मोजाम्बिक जा पहुंचे। उन्होंने मोजाम्बिक के सुल्तान को कई आकर्षक उपहार दिए, जिससे सुल्तान खुश हो गए और वास्कोडिगामा को भारत का रास्ता
इस तरह वास्कोडिगामा 20 मई 1498 को वास्को डा गामा कालीकट तट पहुंचे और वहां के राजा से कारोबार के लिए हामी भरवा ली। कालीकट में वास्कोडिगामा करीब 3 महीने तक रहे और इसके बाद पुर्तगाल लौट गए। वे दोबारा करीब 20 साल बाद भारत आए और यहीं 24 मई 1524 को उनका निधन हो गया।
लिस्बन में वास्को के नाम का एक स्मारक है, इसी जगह से वास्कोडिगामा ने भारत की खोज का सफर शुरू किया था।





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